Saturday, 14 December 2013

बंधन



बंधन में बंधी मैं
बंधन,
बेचेनी बढता है ,
साथ होना अच्छा तो है, पर
मेरे तन्हाई की साधना में कही
विघ्न सा पड़ जाता है

बंधन जो देखते नहीं
उनकी उम्मीद मुझसे बहुत है
बिना लिखे नियम की फ़िखर
दुनिया को ज्यदा है
हर बंधन की कोशिश
होती है जोर से जकड़ कर रखने को
वो जो चाहे मुझे भी अजीज हो
ऐसा कोई बंधन तो नहीं

किसी के साथ मैं पूरी  
किसी की बिन अधूरी
ऐसे किसी बंधन से
मेरी पहचान नहीं


मैं अकेली पूरी हूँ किसी

बंधन की  मोहताज नहीं  

Sunday, 8 December 2013

GAYATRI MANTRA

Aum Bhuh Bhuvah Svah Tat Savitur Varenyam
Bhargo Devasya Dheemahi Dhiyo Yo nah Prachodayat


~ The Rig Veda (10:16:3)

The Meaning

"O thou existence Absolute, Creator of the three dimensions, we contemplate upon thy divine light. May He stimulate our intellect and bestow upon us true knowledge."
Or simply,
"O Divine mother, our hearts are filled with darkness. Please make this darkness distant from us and promote illumination within us."


Wednesday, 4 December 2013

तेरी मर्जी है

है तेरी मर्जी है
मुझे तू चाहे या मुक़र जाए
मेरे साथ दे या न दे
मेरे बातो को सुने या अनसुना करे
देखे या मुह मूड ले

तेरी मर्जी है
पर इंसानियत भी एक शब्द
सुना है मैंने
क्या तूने भी सुना है
अगर है तो तुम्हे तो पता
होगा ही
तुम्हे हक़ है ना पसंद करने का
नही है हक़ किसी की  बेइजती करने का

अपने फयदा के लिए मेरे नुकसान पहुचाने का
अपनी मर्जी से किसी के जिंदगी से खेल जाने का
बस अपनी मर्जी के लिए
कुछ भी कर देने का

Monday, 25 November 2013

सिर्फ तू चाहिए





ज़िन्दगी के हर पल में, मुझे तेरा साथ चाहिए

मेरे शब्दों को तेरा समर्थन चाहिए

हर एक सपने में तेरी तस्वीर चाहिए

गिरते हुए अंशु को तेरा किनारा चाहिए

हर एक कविता को तेरी प्रेरणा चाहिए

हर एक गीत को तेरा सुर चहिये

मेरे हर साँस में तेरे खुशबू चाहिए

मुझे सिर्फ तू और तू चाहिए............

इन लबों को तेरे लबों का एहसाह चाहिए

इस तन को तेरे हाथों का स्पर्श चाहिए

सूरज की पहली किरण,बारिस की पहली बूंद मैं तेरा साथ चाहिए

जाड़ों की ठंडी हवाओ मैं तेरे हाथों हर चाहिए


मुझे सिर्फ तू चाहिए सिर्फ तू चाहिए

Monday, 18 November 2013

तुम मेरी चाहत हो


तुम्हे क्या बताया मैंने
की तुम मेरी चाहत हो
ये आज की बात नहीं
तुम ही मेरी हसरत हो


तुम्हे सोचना अलग सा क्यों है
ये अँधेरे में उजले जैसे है
दुनिया की सचाई में
सपने जैसा है


हो तुम मेरी जिंदगी की किताब
का सुनेहरा सा हिस्सा
हो न खत्म ऐसा किस्सा

खोई राहों की मंजिल
मेरे प्यार का साहिल
तुम ही तुम हो मेरी चाहत
अनमोल निशनी की तरह




Sunday, 10 November 2013

कास के फूल











बर्ष गुजरी सर्द ऋतू आई
कास के फूल हर ओर खिल आई
सुन्द-सुन्दर सफ़ेद न्यारे
खड़े राह के किनारे-किनारे

हवा संग अटखेली करते
धरा संग होली खेले
बदलो से कुछ इतराते
कास के फूल बड़े सुहाते
संगी साथी संग खड़े वो
सबसे अलग रंग रंगे जो
हरयाली के बीचो-बीच
बिछे राहों में

मन को करते पुलकित
हर्ष उल्लास से भरे मुझे
है जो सफ़ेद रंग से सुशोजित
कास के फूल


Friday, 8 November 2013

Market yourself


प्रचार की महानता


प्रचार शब्द से हम सब  बहुत अच्छे से परिचित है जाना पहचाना सा शब्द है,हम रोज़ इससे रूबरू होते है,कभी किसी उत्पाद का प्रचार देखने को मिलता है ,कुछ लोग अपना ही प्रचार करते फिरते है कोई कभी अपनी पार्टी का प्रचार करता है कुल मिला कर प्रचार हमारी दुनिया का बहुत ज़रूरी अंग बन गया है,अगर हम प्रचार का सहारा ना ले तो नौकरी नहीं मिलेगी अपना प्रचार करके अपनी काबिलीयत जो साबित करनी पड़ती है. चलिए असली कहानी पर आते आते है  ये वाक्य है

मेरे गाँव का सड़क से जुड़ा गाँव, सड़क से जुड़े होने पर इसलिए जोर दिया मैंने क्यूंकि गाँव तक पहुचने में कोई भी कठिनाई नहीं होती है  इसलिए नेता,मेला बाज़ार और प्रचार करने वाले लोगो को एक आसान सा चारा मिल जाता है अपना प्रचार-प्रसार करने के लिये, एक दिन दो सजी-सावरी लडकियाँ हमारे गाँव में टूथपेस्ट का प्रचार करने के लिए आई वो घर-घर जा कर लोगो से पूछती की आप कौन सा टूथपेस्ट इस्तमाल करते है अगर जवाब देने वाला कहता की वो वाइट पेस्ट ये एक काल्पनिक नाम है टूथपेस्ट ब्रांड का, तो वो लडकियाँ उन्हें एक फॅमिली पैक वाइट पेस्ट का मुफ्त दे देती.प्रचार करने का अजीब तरीका है अगर समाने वाला आपकी ब्रांड को पहले से इस्तमाल कर रहा है तो उसी को टूथपेस्ट दे कर क्या फयदा चलिए हम को क्या कंपनी समझे प्रचार के दौरान दोनों लडकियाँ कमला के घर पहुची अपना परिचय देते हुए उससे पूछा की वो कौन सा पेस्ट इस्तमाल करती है कमला ने जवाब दिया लाल मंजन और उनको मिफ्त में टूथपेस्ट नहीं मिला,कमला भीतर-भीतर उदास और गुस्सा हुई और कसम खा ली की मुफ्त में मिल रहे टूथपेस्ट को  कैसे ना कैसे करके लेना ही है और दस पड़ोसियों को भी दिलाना है


अरे मुफ्त के समान पर को सबका हक़ होता है वो तो सब की चीज़ होती है और ये तो हमारे खून में है की मुफ्त में ज़हर भी मिले तो खाले दूसरें दिन भी दोनों लडकियाँ प्रचार के काम में लगी थी कमला अपने पडोसी के घर में पहले से ही जा कर बैठी गई की इस बार सही जवाब दे कर टूथपेस्ट ज़रूर लूंगी दोनों लडकियाँ ने घर का दरवज़ा बजाय कमला की सहेली ने दरवज़ा खोला और उनके सवाल का सही ज़बाब दिया क्यूंकि अब गाँव के हर व्यक्ति के जुबान पर वाइट टूथपेस्ट का ही नाम था मुफ्त में मिल रही समान का नाम भगवान की तरह ही सर्व व्यापी होती है कमला भी घूँघट में चेहर छुपाये नाम बदल कर टूथपेस्ट पा लेती है और अपनी चतुरता पर मुस्कुराती है.


प्रचार के कई तरीके है और इसका महत्व भी बहुत होगया है अब राजनैतिक पार्टी का प्रचार की जान कल्याण प्रचार से अधिक भव्य और कलाकारों से सज़ा होता है,बड़े लोगो उल्टा-सीधा बोलकर फेमस हो जाते है,कोई किसी को जूता मर कर फेमस हो जाता है,कोई साठ साल से चल रहे विकास के काम जैसे सडक बना,पुल बनाना और शासन व्यवस्था को चलानो को ही अपनी उपलब्धि बता कर अपना प्रचार कर राह है खर प्रचार कोई भी करे हम  जनता बस हाथ और मुह खोल कर लेने के लिए बैठे रहते है बस पता चले की सब मुफ्त में है,पर एक बात  किसी ने सही कहा है की हर चीज़ की अपनी कीमत होती है मुफ्त की चीजो की भी होती है ..

Sunday, 3 November 2013

रोशनी के दीप

दिवाली के पावन दिवस परिवार, दोस्तों के संग
चलो रोशनी के दीप जलाते है,
कुछ कोने जो कही खली है
चलो उसे रोशन कर आते है

कही कोई रूठा हो तो
जला फुलझड़ी उसे मना ले
रोशन हो हर रिश्ता,
एक दीपक किसी अनजान के नाम जला ले

इस दिवाली हर कोई है
पूछ रहा है सवाल,की
इस दिवाली किसे खुश करेगे आप?

चलो रोशनी के दीप जलाते है,
कुछ कोने जो कही खली है
चलो उसे रोशन कर आते है 

Wednesday, 2 October 2013

Sleeping on the road is scary..


“I do not want to sleep on road side I feel very insecure at night” says a 9 year old girl Sanju of the Baluyahi village of Khagaria district. After the recent floods that hit the state of Bihar she has been forced to live on the National Highway since it is the only high and safe place to camp. Sanju lives here with her family in a temporary makeshift tent arrangement covered with plastic sheets along with more than 200 families of the village.
Sanju and her elder sister Sarita who is 13 years old both in the nearest government school- the school has been closed for three months due to rise in the level of the river water. Sanju does not know when the school will re-open & how she will bring her books.
Sanju is only nine years old but she knows that living on the road is dangerous. She has shared how her friend met with an accident and hurt her right hand while crossing the road. Sanju and her elder sister are scared of sleeping on the road in the night. She said when a big truck passes on the road it feels like an earthquake tremor.
The devastation caused by floods in June 2013 damaged all the houses in the entire village. Children are slowly trying to adapt themselves to the situation. They have spent days wandering on the road. When asked what her ambition is she said she wanted to become a teacher but also raises a concern that the primary school of her village is affected due to the floods as a result of which the teachers and other children do not come to school.

Sanju's father is a rickshaw puller and after the floods he does not get many passengers. Her mother is also not getting any work. Sanju sadly says “My mother cooks meal once a day, on which we have to survive for the whole day. We only have rice and wheat with us which are not sufficient for my family. Had the floods not happened I would have not been sleeping on the road and would also be having sufficient food to eat.”

Monday, 16 September 2013

Three Bandar of Gandhi ji



गाँधी जी को स्वर्ग में रहते हुए बहुत अरसा हो गया है ये तो हम सब जानते है उनका परलोक सुखमय बीत रहा था एक दिन उन्हें अपने तीनो बंदरो की याद आई उन्होंने चित्रगुप्त से पूछा मेरे तीनो बन्दर कहा है?
चित्रगुप्त ने कहा देखिये आप ऐसे ही सोच में पड़े है मेरे पास समय नहीं है बहुत वर्क लोड है मैं अकेला सदियों से लेखा जोखा कर रहा हूँ आप आराम करे उनकी चिंता ना करे इतना सुनते ही गाँधी जी उठे और अनशन पर बैठ गए.
चित्रगुप्त ने सोचा ये आदमी लगता है मुझे भी यहाँ से निकलवाये गा इसके सवालो के जबाब दे कर वापस भेज देता हूँ
चित्रगुप्त ने गाँधी जी से कहा आप का पहेला बन्दर कानून बन गया है उसे अच्छा- बुरा दिखाई नहीं देता है
दूसरा बन्दर तो सरकार बन गया है किसी की सुनता ही नहीं और आप के तीसरे बन्दर ने तो कमाल कर दिया है वो तो प्रधानमंत्री बन गया है.

Sunday, 8 September 2013

मेरे शब्द रूठे है

कुछ लिख नहीं पाने की बेबसी
शब्द खो जाने की उलझन सी
भीतर के अरमान टूट  है
मेरे शब्द मुझसे रूठे है

ये मेरा जो सहारा था
मेरे शब्दों ने जिसे गरोंदे में ढला था
वो सब बिखर गए
पानी के धार में बह गए
अब सिर्फ मैं, एक खली पन्ना
नीली सियाही बची है
मेरे संग कल तक थी जो
मेरे मान का रंग थी जो

वो मेरी कविता मुझसे रूठी है
ये भी इंसानों की तरह झूठी है

अपनी ही बगिया में छाव को तरसता बागवान

स्वतंत्रता दिवस के उत्सव की छठा देखेने की लिए मैं अपने गाँव को चल पड़ा अपने बचपन की स्मृतियों को टटोलने लगा की कैसे १५ अगस्त से हफ्तों पहले से ही बच्चे आज़ादी की गीत गाना शुरु कर देते थे स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रम की तैयरी शुरु हो जाया करती थी बच्चे बहुत उत्साहित रहते थे,बच्पन की मीठी यादो में खोया ही था की सामने गाँव के मुखिया जी दिख गए,बात दुया राम सलाम से शुरु हुई,वो बड़ी गंभीर मुद्रा में दिखाई दे रहे थे मैंने पूछा क्या बात है? “समाज का रंग –ढंग खराब होते जा रहा है मुझे इस का कोई हल समझ नहीं आता कहा कर वो चुप हो गए.उनकी बात तो मेरी समझ में आयी पर उसका मतलब समझ ने के लिए मैंने उनसे पूछा कुछ हुआ है क्या ? आज के दिन बहुत उदास दिखाई दे रहे है . उन्होंने कहा –अब क्या बताऊ आप को,अंग्रेज देश छोड़ गए पर अपने मन का कपट –छल यही छोड़ गए है पता नहीं क्या हो गया है आज़ादी का क्या मतलब किसी के साथ कुछ भी कर सकते है क्या? आज के बेटा-बहु बुजुग माँ-बाप को देखना ही नहीं चाहते,बेचारे दीवाकर जी आखिर कर जुर्म से तंग आकर दम तोड़ दिए. मुझे कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए खुद भी पास वाली कुर्सी पर बैठ गए,मैंने गंभीर होते हुए पूछा कौन है दिवाकर जी ? उन्होंने एक गहरी सी साँस लेकर कहा बड़े भले व्यक्ति थे शरीर से तंदरुस्त मिजाज़ से खुश साथ में मेहनती भी थे खेती बड़ी के साथ दुकान भी चलाते थे, बीवी का स्वर्गवास हुए अरसा हो गया था दोनों बेटे के सहारे जीवन चला रहे थे जब तक शारीर ने साथ दिया खेती की देखभाल किया उन्होंने उसके बाद बस दुकान में बैठने लगे, बड़ा लड़का और बहु स्कूल में टीचर है एक पोता भी है और छोटा दिल्ली में काम करता है पूरी तरह से संपन्न परिवार था एक दिन दिवाकर जी मेरे पास आये उदास मन से कहने लगे बेटे ने जीना मुश्किल कर दिया है रोज़ पैसे के लिए गली –गलोज करता है मेरे शारीर अब काम नहीं करता खान-पीना का भी ठिकाना नहीं क्या करू? मुखिया जी ने आगे की बात सुनाई- हमने उनसे कहा की ये तो हर घर की कहानी है अब आप का शारीर कमज़ोर हो गया है बेटे से लड़ाई करके क्या मिलेगा अब जैसा है आप को इसी के साथ रहना है तो थोड़ा सहन करना पड़ेगा इसके बाद दिवाकर जी चले गए .. ठीक दस दिन बाद दिवाकर जी रोते हुए हमारे पास आये आते ही बोले हमको मार पिट के हमारे हस्ताक्षर कराकर बैंक से पचास हज़ार रूपया निकल लिया है बेटा –बहु ने दोनों मिलकर हमको पीता है तुम ही फैसला करो मेरे बुढ़ापे का सहारा छीन लिया ....दिवाकर जी बात सुन कर मैं कुछ पंचो के साथ उनके घर गया पूछने पर बेटे ने कहा पिता जी पैसे नहीं दे रहे थे मुझे जरुरी काम था,ये अब रुपयों का क्या करेगे सब तो हम बच्चो का है पर मागने पर नहीं देते इसलिए ज़बरदस्ती करनी पड़ी. सबकी बात सुन कर हम पंचो ने निर्णय लिया की आगे से दीवाकर जी का परिवार उनकी देख-भाल सही ढंग से करेगा कोई शिकायत होने पर कारवाही होगी इसके बाद महीने दो महीने सब ठीक रहा एक दिन दोपहर के समय दिवाकर जी अधमरे हालत में मेरे घर आये और घर के बरांडे में आकर गिर पड़े मैंने पीनी पिलाकर उन्हें बैठाया.... उन्होंने आपबीती बताई की पिछले तीन दिनों से उनके बेटे ने उन्हें कमरे में बंद कर रखा है खाना,दवाई सब बंद कर दिया है आज दोनों काम पर गए है तो पोते को रूपये का लालच दे कर कमरे का दरवाज़ा खुलवाकर तुम्हारे पास आया हूँ मेरी मदद करो नहीं ये दोनों मुझे मार देंगे. मैंने उन्हें खाना खिलाया और मेरे घर पर ही रूक जाने को कहा साथ में पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करने की सलाह भी दी पर उन्हें अपने पोते की फ़िकिर थी की बेटा उनको मरेगा इतना कहा कर वो घर चले गए ,उसी शाम मैं गाँव के लोगे के साथ उनके घर गया उनके बेटे से उनकी हालत के बारे में पूछने लगा तबही उनकी बहु गुस्से में वोली: ये हमारी घर की बेइज्जती करते फिरते है, हमारा खाना खाते है हमारी ही शिकायत करते है लगाओ दो हाथ बूढ़े को इतना सुनते ही उनके बेटे ने सब के सामने अपने बुजुग पिता पर हाथ उठा दिया मुझे से बर्दास्त नहीं हुआ मेरे साथ में आये लोगो में से एक ने चप्पल उठाकर दिवाकर जी के बेटे की पिटाई करनी शुरु कर दी मैंने किसी को नहीं रोका में चाहता था की उनकी बेटे –बहु को पता चले की गाँव-समाज दिवाकर जी के साथ है तभी उनकी बहु रोने लगी माफ़ी मागने लगी,दीवाकर जी का बेटा पुलिस स्टेशन जाने की धमकी देने लगा उसने कहा आप लोग मेरे घर में घुस कर मुझे बिना मतलब के मार रहे है,इसपर हमने कहा तुमने अपने पिता जी से साथ हिंसा की है उन्हें मारा-पीता है समाज के सीमा दोडी है तुम्हे सजा मिलनी चाहिए,आप लोग कौन होते है सजा देने वाले कानून है सजा देने की लिए आप लोग पंच के नाते मुझ पर जोर जबरजस्ती नहीं कर सकते पंच किसी पर हाथ नहीं उठा सकते. हमने दिवाकर जी को अपने साथ पुलिस स्टेशन चल कर बेटे –बहु के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने को कहा वो तैयार होगये पर बहु के माफ़ी मागने पर वो रूक गए, बेटे-बहु ने उनका ठीक से देखभाल करने का वादा किया और हम सब वहा से चले आये उस घटना के बाद से एक डेढ़ महीने सब ठीक रहा पर आखिर के दस दिन से तबियत बहुत ख़राब रहती थी पडोसी बताते है की खाना-पानी,दवाई के बिना उनकी ये हालत हुई थी. अगर मुझे कोई पूछे तो मुझे लगता है दिवाकर जी ने उसी दिन से देह त्याग दिया जिस दिन उनके बेटे ने उनपर हाथ उठाया था एक बुजुग बाप अपनी दुर्दशा से तंग आ गया था. मुखिया जी की बात सुन कर हम सब चुपचाप शुन्य की का ख़ामोशी से एक दूसरें दो देख रहे थे सभी को पता था गाँव में कोई –कोई बुगुर्ग अपने बच्चो की ऐसी ही शिकायत लिए अक्सर आते रहते है और इस समस्या का कोई समाधान नज़र नहीं आया रहा है

Wednesday, 21 August 2013

Uttrakhand Flood-देव्याः आपदा या इन्सान का प्रकृति पर अत्याचार


उत्तराखंड देव भूमि के नाम से विख्यात है चार धाम,अति प्राचीन धार्मिक स्थल एवम् अतुलनीय प्राकृतिक सौंदर्य इस राज्य की पहचान है जैसे –जैसे हम पहाड़ो sकी ऊचाई पर पहुचते है खूबसूरती का दायरा बढ़ता जाता है भूस्खलन,अधिक बारिश यहाँ के लिए समान्य बात है लेकिन इस बार आयी त्रासदी ने पुरे राज्य को हाशिए पर ला कर खड़ा कर दिया है,आपदा के  लगभग दो  महीने के बाद भी पीड़ितो तक राहत सामग्री पहुचना आसान नहीं है,लगातार हो रही बारिश और भूस्खलन ने सुदूर बसे गाँव तक पहुचना मुश्किल कर दिया है.केदारनाथ में हुई तबाही का पैमाना बहुत व्यापक था जान –माल की हानि का सही –सही अनुमान लगाना नामुमकिन है इससी के साथ उत्तराखण्ड के अन्य जिला जैसे  उत्तरकाशी,चमोली,तेहरी,  और पिथोरागढ़ में भी  नुकसान बहुत हुआ है.
सरकार ने सेना की मदद से केदारनाथ से तीर्थयात्री और ग्रामीणों को सुरक्षित स्थान पर पंहुचा दिया लेकिन अन्य आपदा ग्रस्त क्षेत्र जैसे बद्रीनाथ,पन्दुकेश्वर,गोविन्दघाट और लम्बागढ़ गाँव में बाढ़ ने नदी किनारे बसे होटल और घरो को ताश के पत्तो की तरह अपने साथ बहा दिया इन होटल और लॉज में रुके तीर्थयात्री कुल संख्या किसी को नहीं पता.गाँव के लोग बताते है की रात के दो बजे वो अपनी जान बचा के अपने घरो को छोड़ कर ऊपर पहाड़ो की तरफ भागे पर होटल में रुके कुछ यात्री इससे पहले संभल पाते नदी उन्हें अपने साथ बहा ले गई.
सरकार अपने स्तर पर कोशिश कर रही है बचाव का कार्य व्यापक रूप से किया गया है पर राहत समाग्री उन्ही गाँव तक पहुच पा रही है जहां तक सड़क साथ देती है,उसके बाद लोगो को सामान अपने पीठ पर बांध अपनी जान को खतरे में डाल कर पहाड़ी के रास्ते आपने घर तक जाना पड़ता है.
हर अख़बार और न्यूज़ चैनल में प्रकृति को ही  तबाही का ज़िम्मेदार ठहरया जा रहा है,नदी ने तबाही मचाई
असमान से आफत आयी लेकिन स्थानीय लोगो की सुने तो कहानी कुछ और ही समझ आती है उनके अनुसार
पहाड़ो ने बहुत समय से बहुत सहन करने के बाद संतुलन का रास्ता अपनाया.विकास के लिए बनाएं जा रहे हजारो जलविधुत परियोजनाओं ने नदियों के मार्ग में दीवार बना कर मानवी आपदा की तरफ़ कदम बढ़ा दिया था  साथ ही पर्यटन को विकसित करने के लिए पहाड़ो को काटकर लॉज,होटल और रास्ते बनाएं जा रहे है जिसके परिणाम स्वरुप पहाड़ो को व्यापक तौर से नुकसान पहुच रहा है.हिमालय की त्रासदी की जिमेदारी प्रकृति नहीं बल्कि पूरी तरह हम इंसानों द्वारा अपनों नदियों और जंगलो का बिना सोचा समझा किया गया दोहन है.एक रिपोर्ट के अनुसार केदारनाथ में हुए तबाही की चेतावनी २००४ में ही एक भू-विज्ञान संस्थान ने दे दी थी साथ में यह सुझाव दिया गया था की  केदारनाथ के पीछे बने झील और ग्लेशियर का लगातार निगरानी और रखरखाव नहीं हुआ तो बड़ी त्रासदी की सम्भवना है  पर सरकार ने इस रिपोर्ट की कोई ध्यान नहीं दिया  जिसका परिणाम  १६-१७ जून २०१३ को एक बड़ी तबाही के रूप में सब के सामने है.

विकास की होड़ ने विनाश का रूप ले लिया पर्वत में रास्ता बनाने के लिए बिस्फोटक का इस्तमाल किया जाता है जिससे ना केवल पहाड़ का एक हिस्सा टूटता है बल्क़ि पुरे पर्वत की नीव को कमजोर कर देता है, लगातार बर्षा कमज़ोर हिस्से भूस्खलन के रूप में गिर जाते है. उत्तरखंड में लगभग कई छोटे बड़े विधुत केंद्र का निर्माण चल रहा है इनके उतर्गत नदियों की दिशा को बदला जा रहा है पहाड़ो में सुरंग बना कर उन्हें भीतर से खोखला किया जा रहा है  बात केवल पहाड़ो के साथ हो रहे छेड़-छाड़ तक सिमित नहीं है.ग्लोबल वार्मिंग का असर भी आसानी से देखा जा सकता है पहाड़ो में गर्मी से पड़े दरार, ग्लेशियर के पिघलने के दर में तेज़ी  और सर्दियों के मोसम का अपेक्षाकृत छोटा होना गंभीरता से सोचने वाले मुद्दा है.क्यूंकि हिमालय से ही हमारे देश की मुख्य नदिया निकलती है यदि ये नदिया समय से पहले सुख जाये तो देश में पानी की गंभीर समस्या उत्पन्न हो सकती है हिमालय जिसे नाजुक परिस्तिथि क्षेत्र के लिए स्थानीय समुदाय के साथ मिलकर विकास की रूप रेखा तैयार करने की आवश्यकता है.
 

Tuesday, 25 June 2013

दास्ताँ है ज़िन्दगी की

रोज़ सुबह जग कर
संकल्प नया करना
दिन- भर भगना दौड़ना
सपनो का पीछा करना
की गई कोशिशों पर पछताना
अपनी नाकामी का ज़िम्मेदार
दूसरो को ठहराना
ये ही दास्ताँ है ज़िन्दगी की
रोज़  नए अरमान है ज़िन्दगी की

Friday, 14 June 2013

वेद-प्रेम का ज्ञान

ऋषि यज्ञावलक्य संसार त्याग कर सन्यास लेने का निर्णय कर चूके है उन्होंने अपनी दोनों पत्नियों को अपने पास बुलाकर कहा,आप दोनों ने मेरे गृहस्थ और वन्प्रस्त दोनों आश्रम काल में मेरे जीवन के उदेश्य की प्राप्ति में पूरा सहयोग दिया है मेरी नहीं चाहता की मेरे नहीं रहने पर आप दोनों देवियों में सम्पति कलह का कारण बने इसलिए मैंने सोचा है आप दोनों देवियों में आश्रम की सम्पति बराबर में वितरित कर दूं
कत्यानी और मैत्रेयी दोनों ऋषि की बाते सून रही थी,
कत्यानी समझती थी ऋषिवर को उनके संकल्प से हटाना संभव नहीं है,उसने कहा मैं अब आपके साथ नहीं चल सकती तो आप के मार्ग में बाधा भी नहीं बनूगी मुझे आपका निर्णय स्वीकार है.
ऋषि अब मैत्रेयी की ओर देखते है, मैत्रेयी गहन विचार में डूबी सोच रही है. वो क्या है जिसके लिए ऋषि संसार को छोड़ रहे है जो उन्हें ब्रह्मचर्यं,ग्रहस्त और वनाप्रस्त आश्रम में प्राप्त नहीं हुआ.
 ऋषि की ओर देख कहती है, ऋषिवर जो सम्पति आप को पूरा ज्ञान और संतुष्टि नहीं दे सकी वो मेरे किस काम की  आप चाहे तो मेरे हिस्सा का  सम्पति भी देवी कत्यानी को समर्पित कर दे और आप मेरी जिज्ञासा का समाधान करे,ऋषि प्रसन्न हो कर मैत्रेयी को कहते है पूछो तुम्हे क्या जानना है,ऋषिवर क्या अब आप को आपकी प्रसिद्धि से प्रेम नहीं रहा,अपनी दोनों पत्नियों से प्रेम नहीं रहा,क्या ये सब आप को ख़ुशी नहीं देती.

ऋषि कहते है,हे मैत्रेयी सुनो  एक पत्नी अपने पति को उसके पति होने के करण प्रेम नहीं करती,ठीक वैसे ही एक पति अपनी पत्नी को उसके पत्नी होने के करण प्रेम नहीं करता वो दोनों अपने आप को प्रेम करते है,हमें केवल आपने आप से प्रेम होता जब हमें संसार की बाहर की वास्तु प्रिय होती है उसका मूल स्रोत अपनी आत्मा को खुश करने की चाह से ही उत्पन्न होती है हम और हमारी आत्मा प्रेम स्वरुप है,जहां हमें प्रेम और अपनेपन की अनुभति होती है हमें वोही अच्छा लगता है धन,संतान सब उनके होने के करना प्रिये नहीं है वो हमारी आत्मा की इच्छाओं की पूर्ति करते है इसलिए हमें प्रिय है.
अब मुझे मेरा वैभव,प्रसिद्धि,धन,रिश्ते सुखा नहीं देते,मैं सुख-दुःख जैसे आस्थाई मोह से आगे बढ़ कर संसार को समझे के लिए सन्यास लेना चाहता हूँ. मैत्रेयी ध्यानपूर्वक ऋषि की बाते  सुन रही थी.कत्यानी दोनों में हो रहे संवाद को दूर खड़ी सुन रही है.

Monday, 10 June 2013

गंगा -कुछ कहा रही हमसे

गंगा

क्या कोई सुनेगा मेरी भी बात
क्यों है दूर- दूर तक छाई वीरानी
सूखे पनघट,टूटे नाव, नहीं मेरा कोई निशान
क्यों हूँ आज में दुखी ,अपने ही जन
से रूठी वीरान गंगा
नहीं रही अब में वेदों की महान गंगा
भैरव की शीर्ष की शोभा
माँ के समान पूजनीय गंगा
कभी थी में देश की रक्त वाहनी
भागीरथ की कुल की स्वमानी
अब हूँ में नाले समान
अब में लोगो के पाप नहीं
उनके अभिशाप को ढोती हूँ
क्यों मुझ मैं तू डूबकी
लगए,जब तू मेरी पवित्रता
को ही सभाल ना पाए?


Thursday, 30 May 2013

School Managment Commeette


विधायल प्रबंधन समिती
भारत सरकार के द्वारा पारित अधिनियम “शिक्षा के अधिकार “ २००९ के अंतर्गत 6 से १४ वर्ष के बच्चे को मुफ्त एवं अनिवार्य  शिक्षा उपलब्ध करना का कानून पारित किया इस कानून के अंतर्गत समुदाय की सहभगिता को स्कूल के प्रबंधन कार्य में सुनिश्चित करने के किये “विधायल प्रबंधन समिती” का गठन करने की संकल्पना की है,तथा इसे हर सरकारी विधायल मैं बनाने के लिए अनिवार्य किया है.
विधायल प्रबंधन समिती की गठन की संरचना
·         राज्य के प्रतेक विधायल में समिति का गठन होना जरुरी है
·         समिती का गठन निर्वाचन से किया जायेगा,जिसमे विधायल में नामांकित बच्चो के माता/पिता ही भाग ले सकेगे.
·         समिति मैं 75% अभिभावक सदस्य रहेगे,समिति की कुल संख्या 14 होगी जिसमे 12 सम्बंधित स्कूल मैं पढने वाले बच्चो के माता/पिता  होगे.
·         समिति मैं दो सदस्य अनिवार्य होगे एक सम्बंधित विधायल का प्रधानाध्यापक/शिक्षक और विधायल जिस वार्ड में आता है उसका वार्ड मेम्बर.
·         समिति का कार्यकाल तीन वर्ष का  होगा

तदर्थ समिति
बिहार राज्य में विधायल प्रबंधन समिती के स्थान पर “तदर्थ समिती” का गठन किया जाया है इसकी मूल संरचना “विधायल प्रबंधन समिती” जैसी ही रखी गई है पर इसमें महत्वपूर्ण बदलाव किये गए है.
·         तदर्थ समिती में सदस्यों की संख्या कुल 6 रखी गई है,जिसमे सम्बंधित विधयाला में नामांकित बच्चो के4 माताए होती है. (कक्षा 2 और अंतिम कक्षा में पढने वाले बच्चो की दो-दो माता)
·         समिति में दो सदस्य अनिवार्य होगे एक सम्बंधित विधायल का प्रधानाध्यापक/शिक्षक और विधायल जिस वार्ड में आता है उसका वार्ड मेम्बर.
·         समिती का निर्वाचन प्रतेक वर्ष होना है.
विधायल प्रबंधन समिती/तदर्थ समिती के कार्य
समिति को कानून के अंतर्गत निम्लिखित जिम्मेदारी प्रदान की गई है
·         विधायल के पोषक क्षेत्र के अन्दर आने वाले 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चो का शत-प्रतिशत नामांकन
होना सुनिश्चित कराना
·         विधायला भवन निर्माण,मध्यन भोजन की देखभाल
·         स्कूल समय पर खुलना और बंद हो  रहा है
·         शिक्षको की उपस्तिथि को देखना
·         शिक्षक बच्चो को मरे-पिटे,दुर्वेव्हार,भेदभाव करे तो समिति के निर्णय से उसकी शिकायत पधाधिकारी को करना
·         वितीय वर्ष के 2 माह पहले विधायल विकास योजना बनाना तथा प्रखंड शिक्षा पधाधिकारी के साथ जिला में प्रेषित करना
·         प्रतेक माह  में बैठक और बैठक की कार्यवाही पंजी मैं सभी सदस्यों के हस्ताक्षर हो
·         शिक्षक बच्चो को पढ़ा रहे है या नहीं
·         विधयाला साफ़-सुधरा है की नहीं
·         सभी बच्चो के पास पुस्तक है की नहीं
·         सभी बच्चे पोशाक मैं है की नहीं

पिया....

बंद दरवाज़ा देखकर लौटी है दुआ आँख खुली तो जाना ख्याव और सच है क्या धीमे-धीमे दहक रहे है आँखों में गुजरे प्यार वाले पल...