Tuesday, 4 August 2015

प्रेम परीक्षा

कहत कबीर प्रेम जैसे लम्बा पेड़ खजूर
चढ़े तो प्रेम रस मिले
गिरे तो चकनाचूर

प्रेम जैसे अग्नि परीक्षा
जो पार न किया तो खाक
पार कर जाने पर भी वनवास

प्रेम धागा कच्चा सा
पिरोए मोती तो टूट जाए
बधे कलाई पर तो
अटूट विश्वास सा बंध जाए

बसे पिया नयन में ऐसे
उसमे कोई कहा समाए
प्रेम जैसे गीत सा,
मन ही मन गुनगुनाऊ

Monday, 3 August 2015

परछाई

बादल के परछाई के पीछे चल दिए
नंगे पैर,
टूटी,बिखरी उम्मीद लिए
चल पड़ी बेखबर सी
झूठे सपनो को लिए

बादल जिसका पीछा किया
खेलता आंख मिचोली
जा छुपता धूप के आट में कभी
तो कभी असमान में हो जाता गुम
हम बस पीछे रहे बादल के
मन में लिए एक धुन

धुंध सी जो आँखों पर छाई है
हटती ही नहीं
बादल जिसकी परछाई है, बरसती ही नहीं

थक गया मन
बादल के पीछे-पीछे
बस बरसे वो बदल बन अमृत मुझपे
आंख मूंद होजाऊ
उस बादल की परछाई में गुम

रिंकी

 

लघु कथा- मानवता और मज़हव

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