Monday, 31 July 2017

ख़त इन्सान के नाम


 
हे  पर्थ
याद रख ये बात
करता भी तू है
भरता भी तू है
भोगता भी तू है

मैं तो शुन्य हूँ
जिसे समझ पाना
तेरे बस की बात नहीं

तू काटे पेड़
दूषित करे जल
उजड़े धरती अपनी
जला दी तूने धरती सारी

और पूछाता है
मुझसे तू  की, मैं कहाँ हूँ

प्रकृति अपने नियम
से चलती है
बरसती, जलती,हवा हो तेज़ उडती

 तू  चाहता है प्रकृति को काबू करना
अगर वो संतुलन बनाने की लिए
रूद्र हो जाए

तो तू कहता है
इश्वर तू ने क्या किया

एक बात मैं फिर कहता हूँ
करता भी तू है
भरता भी तू है
भोगता भी तू है

रिंकी
 


Thursday, 27 July 2017

अच्छी दुल्हन


नई नवेली दुल्हन जब उसके जिंदगी में आई तो उसकी दुनिया स्वर्ग सी हो गईI वो बस उसको निहारता रहता और मन में हो रही गुदगुदी को छुपाते हुए मुस्कुरा देताI हर बात पर कहता मुझे बहुत अच्छी दुल्हन मिली है, अब साल होने को आया है, वो अपनी दुल्हन के साथ बहुत खुश हैI उनकी दुल्हन कुछ दिनों से परेशान सी दिखाई दे रही है,उसने कई बार कारण पता करने की कोशिश की पर दुल्हन चुप रहीI और एक दिन उसने कहा की उसकी आँखों और सर में दर्द  हैI
वो उसे डॉक्टर से चेक-उप करने ले गया I डॉक्टर ने दुल्हन से पूछा आपने चश्मा लगाना क्यूँ छोड़ दिया?

आपकी आँखों की रोशनी पर बहुत असर पड़ रहा है, दवाइयां और चश्मा लेने के बाद दोनों घर आए
उसने पूछा तुमने चश्मे वाली बात क्यूँ छुपाई? उसकी दुल्हन ने रोते हुए कहा,मुझसे माँ ने कहा था की किसी को मत बताना नहीं तो लोग तुझे अच्छी दुल्हन नहीं कहेंगेI

Friday, 21 July 2017

सौ में सतर आदमी


सौ में सतर आदमी...

सौ में सतर आदमी
पिलहाल जब नाशाद है
दिल पे  रखकर हाँथ कहिये
देश क्या आज़ाद है

कोठीयों से मुल्क की
मायर को मत अंकिये
असली हिंदुस्तान तो
फूटपाथ पर आबाद  है

सताधारी लड़ पड़े है
आज कुतो की तरह
सुखी रोटी देखकर
हम मुफलिसों के हाँथ में

जिस शहर के मुन्तजिम
अन्धे हो जल्वागाहा के
उस शहर में रोशनी की
बात बेबुनियाद है

जो उलझ कर रह गई है
फ़ाइल के जाल में
रोशनी  वो गाँव तक
पहुचेगी कितने साल में

सौ में सतर आदमी


 लेखक -अदम गोंडवी

Wednesday, 12 July 2017

लघु कथा- मानवता और मज़हव

उसकी बहन उसे बस पर चढ़ाने आई, शायद वो पहली बार अपने-आप यात्रा कर रही थीI उसने बहन से कहा की ड्राईवर और कंडक्टर से कहो की मुझे अन्धन्य मोड़ (उसका स्टॉप )पर उतार दे , बहन ने कहा दियाI बस चल पड़ी धीरे –धीरे यात्री उतारते  रहे उसने कंडक्टर से पूछा मेरा स्टॉप कब आयेगा, कंडक्टर ने भोला सा मुह बना कर कहा  ये बस उस रास्ते से नहीं जाती जहा आपको जाना है, आपको बस बदलनी होगीI  फिर तो बस में ग़दर मच गया उस औरत को जीतनी गलियाँ आती थी उसने ड्राईवर और कंडक्टर को दे दी I सह यात्रियों ने सहानभूति जताई,कुछ लोगो ने जाने का रास्ता समझया पर समस्या ये थी की उसके पास रुपए नहीं थे, सब समझा रहे थे, तभी उसकी सीट के पीछे से एक महिला ने उसकी तरफ कुछ रुपए देते हुए कहा, रो नहीं हम आपके साथ हैI


लाल बिंदी,चूड़ी और साड़ी पेहनी उस महिला ने धन्यवाद भरी नज़रो से उस बुरखा पेहनी औरत को देखाI

Rinki


















👪👭

Thursday, 6 July 2017

मैं और तुम


मुझसे ये सवाल न पूछ
की
मैं कैसी हूँ?
मैं तो
रात जैसी हूँ
जो दिन के उजाले में
तुम्हे
दिखाई नहीं दूंगी

और
तुम हो वो सूरज हो
जो मेरे अन्दर कभी  ढलता
ही नहीं

यही फर्क है हम दोनो मे...




रिंकी

पिया....

बंद दरवाज़ा देखकर लौटी है दुआ आँख खुली तो जाना ख्याव और सच है क्या धीमे-धीमे दहक रहे है आँखों में गुजरे प्यार वाले पल...