Monday, 31 July 2017

ख़त इन्सान के नाम


 
हे  पर्थ
याद रख ये बात
करता भी तू है
भरता भी तू है
भोगता भी तू है

मैं तो शुन्य हूँ
जिसे समझ पाना
तेरे बस की बात नहीं

तू काटे पेड़
दूषित करे जल
उजड़े धरती अपनी
जला दी तूने धरती सारी

और पूछाता है
मुझसे तू  की, मैं कहाँ हूँ

प्रकृति अपने नियम
से चलती है
बरसती, जलती,हवा हो तेज़ उडती

 तू  चाहता है प्रकृति को काबू करना
अगर वो संतुलन बनाने की लिए
रूद्र हो जाए

तो तू कहता है
इश्वर तू ने क्या किया

एक बात मैं फिर कहता हूँ
करता भी तू है
भरता भी तू है
भोगता भी तू है

रिंकी
 


प्रेम में मिलावट

only you प्रेम शुद्ध कांच सा निर्मल था जब पेहली बार बचपन और यौवन के बीच हुआ धीरे-धीरे,जैसे-जैसे  प्रेम को ...